बैठा हूँ इस केन किनारे। दोनों हाथों में रेती है, नीचे, अगल-बग़ल रेती है होड़ राज्य-श्री से लेती है मोद मुझे रेती देती है रेती पर ही पाँव पसारे बैठा हूँ इस केन किनारे। धीरे-धीरे जल बहता है सुख की मृदु थपकी लहता है बड़ी मधुर कविता कहता है नभ जिस पर बिंबित रहता है […]
